काव्य किसे कहते हैं। परिभाषा, भेद और गुण

काव्य – Kavya in Hindi Grammar

 

काव्य का अर्थ : – ‘तददोषौ शब्दार्थौ सगुणवणलंकृति पुनः क्वापी।’

 

संस्कृत आचार्य मम्मट ने यह काव्य लक्षण दिया। आचार्य ने शब्द और अर्थ की को काव्य माना। ये शब्द और अर्थ दोनों अदोषौ अर्थात दोष रहित हों, सगुण अर्थात ओज, माधुर्य और प्रसाद तीनों गुणों से युक्त हो तथा आवश्यकतानुसार अलंकारयुक्त भी होने चाहिए।

 

‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम।’

आचार्य विशवनाथ ने रसयुक्त को काव्य कहा।

 

काव्य के गुण

 

‘काव्यालंकारसूत्र’ के निर्माता वामन हैं। उन्होंने अपने ग्रन्थ में ‘गुण’ शब्द  स्पस्ट करते हुए लिखा — “काव्यशोभाया: कर्त्तारो धर्मा गुणा:।” शब्द/अर्थ के जो धर्म (कार्य व्यापार) काव्य की शोभा उत्पन्न करते हैं, वे गुण कहलाते हैं।

 

वामन ने दस प्रकार के शब्द गुण और दस प्रकार के अर्थगुण माने लेकिन मम्मट ने केवल तीन गुण (ओज, माधुर्य एवं प्रसाद) ही माने। गुण यमक, उपमा, श्लेष आदि अलंकारों के बिना भी काव्य की शोभा बढ़ा सकते हैं इसीलिए ये गुण कहलाते हैं।

 

काव्य में गुणों के बिना व्यवहार नहीं हो सकता अतः काव्य में गुण अनित्य (अपरिहार्य) हैं। वामन के मतानुसार काव्यशोभा के उत्पादक धर्म गुण कहलाते हैं और गुणों द्वारा उत्पादित उस काव्य शोभा की वृद्धि करने वाले धर्म अलंड्कार कहलाते हैं।

 

1 . माधुर्य गुण –

 

कानों को प्रिय लगने श्रव्यकाव्य माधुर्ययुक्त होता है। सामान्यत: संयोग शृंगार में रहने वाला माधुर्य गुण शृंगार, करुण और शांत रस में अतिशयरूप में होता है।

 

माधुर्य गुण युक्त रचना को पढ़कर वक्ता और श्रोता दोनों की चित्तवृत्ति द्रवित हो जाती है। समासरहित/अल्पसमास युक्त रचना प्रायः माधुर्य में ही होती है। यथा —

 

अमिय हलाहल मद भरे, स्वेत श्याम रतनार।

जियत मरत झुकि झुकि परत जे चितवत इक बार।।

 

2 . ओज गुण –

 

वीररस में रहने वाले चित (आत्मा) के विस्तार की हेतुभूत दीप्ति ओज कहलाती है। इसको पढ़कर श्रोता और पाठक के हृदय में उत्तेजना उत्पन्न होती है।

 

यह सामान्यतः वीर रस में और आधिक्यता से वीभत्स और रौद्र रसों में रहता है। वह इन दोनों रसों (वीभत्स एवं रौद्र) में अतिशय/चमत्काररूप में रहता है।

 

दीर्घ समास, द्वित्व वर्ण और चतुर्थवर्णषकर का प्रयोग, विकट रचना ओज गुण युक्त काव्य की विशेषताएँ हैं। यथा —

 

हय रुंड गिरे, गज सूंड गिरे, कट-कट अवनि पर तुंड गिरे।

भू पर हय विकल वितुंड गिरे, लड़ते-लड़ते अरि झुंड गिरे।।

 

3 . प्रसाद गुण – 

 

सूखे ईधन में अगिन के समान अथवा स्वच्छ जल के समान जो चित (ह्रदय) में सहसा व्याप्त हो जाता है, वह सर्वत्र (सभी रसों) में रहने वाला प्रसाद गुण कहलाता है।

 

प्रसाद युक्त रचना में सुनने मात्र से शब्द के अर्थ का ज्ञान हो जाता है। वर्णो, समासों और रचनाओं में प्रसाद गुण पाया जाता है। समस्त रसों में प्रसाद गुण पाए जाता हैं। यथा —

 

(क.) हे प्रभो! आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिए।

शीघ्र सारे दुर्गणों को दूर हमसे कीजिए।।

 

(ख.) देखि सुदामा की दीन दशा करुणा करिकै करुणानिधि रोये।

पानि परात को हाथ छुयो नहीं नैननि के जल सौं पग धोये।।

 

” धन्यवाद